मेला में न ठहरने की ब्यवस्था है न पेजल का संसाधन ।

महिलाओं की सुरक्षा से जुड़ी सवालों की न तो प्रशासन के पास कोई जबाब हैं, और न तो उनके अस्मिता के रखवाले‌ के पास कोई जबाब हैं।

प्रेत बाधा से मुक्ति के लिए आयोजित मेले में जहां महिलाएं खुले आकाश मे शौच के लिए मजबूर है वहीं महिलाओं के सुरक्षा को लेकर सवाल सामने आकर खड़ा हो जाते हैं।

जस्टिस न्यूज़

“प्रेत बाधा से मुक्ति पाने के नाम पर” नाली की गंदे पानी से बजबजाती तालाब में महिलाएं स्नान करते हुए दिख रही है और स्नान के बाद देवी मंडल तक पहुंच कर प्रेत बाधा से मुक्ति के लिए देवी की भक्ति -आराधना में जुटी हुई है, इसे अंधविश्वास कहें या पाखंड, यह सरकार व प्रशासनिक अधिकारियों की समझ से परे हो चुका है।

अंधविश्वास को रोकने के लिए देश में कानून लागू है, उसके लिए प्रशासन को तत्पर रखा गया है वहीं प्रशासनिक संरक्षण में बिहार प्रदेश के औरंगाबाद जिले के कुटुम्बा प्रखंड की धरती पर “प्रचलित महुआ धाम” में प्रेत बाधा मुक्ति से जुड़ी मेले का आयोजन “गत वर्षो की भांति” इस वर्ष भी प्रशासनिक संरक्षण में किया गया है।

शारदीय नवरात्र एवं चैती नवरात्रा में 9 दिनों तक कुटुम्बा प्रखंड की धरती “महुआ धाम “मे प्रेत बाधा मुक्ति मेला का आयोजन गत वर्षो की भांति इस वर्ष भी सरकार के अधिकारियों द्वारा आयोजित किया गया और खुलेआम अंधविश्वास की बढ़ावा दिया जा रहा है। वहीं आयोजित मेला का ठेकेदारी से सरकारी राजस्व की वसूली किया जाता है अथवा अंचल अधिकारी कुटुम्बा द्वारा राजस्व कर्मचारी के माध्यम से मेले का टैक्स की वसूली कराया जाता है,जो एक गंभीर चिंता का विषय है।

प्रेत बाधक मुक्ति के नाम पर आयोजित मेले से जुड़े अधिकारी ,राजस्व पदाधिकारी/ अंचल अधिकारी कुटुम्बा कहते हैं की मेले के लिए परमिशन नहीं लिया गया है, मेला का आयोजन गैर कानूनी है। मेला का आयोजन अगर गैर कानूनी है तो सरकार के अधिकारी किस हैसियत से मेले में राजस्व वसूली करते है अथवा मेला को ठेका पर देते है ।

ज्ञात हो कि अंधविश्वास को रोकने के लिए देश में कानून व्यवस्था बना हुआ है और लागू भी हैं। रोकथाम के लिए संबंधित अधिकारी और न्यायिक पदाधिकारी / दंडाधिकारी भी मौजूद है। वही अंधविश्वास को रोकने की जगह सरेआम निजी स्वार्थ में कुछ अधिकारी खुलेआम अंधविश्वास की बढ़ावा दे रहे हैं, जो जांच का विषय है ।

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